
युपी मुस्लिम वोटरों ने खमोशी से पलटा यूपी का नतीजा,
युपी मुस्लिम वोटरों ने खमोशी से पलटा यूपी का नतीजा, ध्रुवीकरण को रोका और किसी चाल में भी नहीं फंसे……
नई दिल्ली, @MaruSangram। यूपी लोकसभा चुनाव में मुस्लिम वोटरों ने साइलेंट मोड में बड़ा उलटफेर किया। उत्तर प्रदेश से इस बार भले ही पांच मुस्लिम सांसद लोकसभा पहुंचे हों मगर मुस्लिम वोटरों की सपा-कांग्रेस के इण्डिया गठबंधन के पक्ष में हुई लामबंदी सार्वजनिक नहीं होने पाई। इन दोनों दलों के नेताओं, प्रचारकों के साथ ही देश की मुस्लिम राजनीति में सर्वाधिक चर्चित असद्उदुदीन ओवैसी तक ने बहुत मुखर होकर भाजपा या हिन्दुत्व के खिलाफ तीखी टिप्पणियों से परहेज ही किया। वह चाहे ओबीसी कोटे से मुस्लिम आरक्षण हटाने का मुद्दा रहा हो या फिर यूपी में सरकारी मदरसे बंद करने का सवाल मुस्लिम अवाम के साथ उनके हितैषी कहे जाने वाले सपा, कांग्रेस, बसपा जैसे बड़े दलों के नेताओं के साथ मुस्लिम सामाजिक संगठनों, तंजीमों ने चुप्पी साध रखी थी। यही वजह रही कि क्रिया की प्रतिक्रिया नहीं के बराबर हुई और यूपी का यह लोकसभा चुनाव साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की चपेट में आने से बचा रहा।
लोकसभा चुनाव शुरू होने से पहले ‘हिन्दुस्तान’ से बातचीत में एक प्रमुख मुस्लिम धर्मगुरु ने कहा था कि जब तक धर्म और राजनीति को मुसलमान साथ लेकर चलेंगे तब तक उनका भला होने वाला नहीं। शायद उनकी यह बात अन्दरखाने प्रदेश की मुस्लिम कौम व उनके नुमाइंदगी का दावा करने वाले नेताओं, संगठनों व राजनीतिक दलों तक पहुंच चुकी थी। यही वजह रही कि इस बार प्रदेश में मुस्लिम मतदाताओं ने बड़ी खामोशी के साथ देश की सबसे बड़ी पंचायत के लिए अपना जनादेश तय किया।
बसपा की चाल में नहीं फंसे:
बताते चलें कि 2014 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश से एक भी मुस्लिम सांसद लोकसभा नहीं पहुंचा था, लेकिन 2019 के पिछले लोकसभा चुनाव में प्रदेश से छह मुस्लिम चेहरे लोकसभा में पहुंचे। पिछले चुनाव में जीतने वाले छह मुस्लिम सांसदों में से तीन सपा से और तीन बसपा से रहे। प्रत्याशियों की बात की जाए तो 2019 के चुनाव में सपा ने चार, बसपा ने छह मुस्लिम उम्मीदवार उतारे थे।
कांग्रेस ने सात मुस्लिम प्रत्याशियों को टिकट दिया था। इस बार यानि 2024 के लोकसभा चुनाव की बात करें तों राजनीतिक दलों ने पिछले चुनाव के मुकाबले कम मुस्लिम नेताओं को चुनाव मैदान में उतारा। सबसे ज्यादा बसपा ने 20 उम्मीदवार खड़े किए। कांग्रेस ने दो, सपा ने चार उम्मीदवार उतारे। शायद यह भी साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण से बचने की एक जुगत रही हो।
खुश करने वाले दलों को नहीं दी तरजीह:
आल इण्डिया मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड के प्रवक्ता डा. क़ासिम रसूल इलियास कहते हैं- ‘यह सही है कि इस बार देश और खासतौर पर उत्तर प्रदेश के मुसलमानों ने लोकसभा चुनाव का साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण नहीं होने दिया।
उत्तर प्रदेश की बात करें तो बसपा ने भाजपा को खुश करने के लिए ही सबसे ज्यादा मुस्लिम उम्मीदवार उतारे मगर अन्य सपा, कांग्रेस जैसे दलों ने इससे परहेज किया। यही नहीं भाजपा व उनके सहयोगी दलों के नेताओं ने कई भड़काऊ बयान दिए, मगर गैर भाजपाई दलों के नेताओं के अलावा मुस्लिम संगठनों, तंजीमों, धर्मगुरुओं ने उसका संज्ञान ही नहीं लिया।’
Author: Sarjit Singh







