
मासिक नाट्य संध्या ‘रंगशाला’ में ‘ऐसो चतुर सुजान’ नाटक का मंचन
मासिक नाट्य संध्या ‘रंगशाला’ में ‘ऐसो चतुर सुजान’ नाटक का मंचन….
उदयपुर, @MaruSangram। झीलों की नगरी में रविवार को शिल्पग्राम के दर्पण सभागार में पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र, उदयपुर द्वारा आयोजित मासिक नाट्य संध्या ‘रंगशाला’ में ‘ऐसो चतुर सुजान’ नाटक का मंचन हुआ। कल्पना संगीत एवं थियेटर संस्थान, बीकानेर द्वारा संगीतमयी राजस्थान लोक नाटक ‘ऐसो चतुर सुजान’ नाटक के मंचन को दर्शकों ने बहुत सराहा।
लेखक हरीश बी. शर्मा द्वारा लिखित इस नाटक में 22 कलाकारों ने अपने पात्रों को बखूबी निभाया। इसका निर्देशन विपिन पुरोहित ने किया।
पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र उदयपुर की ओर से आयोजित मासिक रंगशाला में बीकानेर की टीम की ओर से इस नाटक का मंचन किया गया।
देश में चुनावों का माहौल चल रहा है तो हजारों साल पुरानी घटना पर नाटक की कहानी भी समसामयिक रही। क्योंकि कहानी एक ऐसे व्यक्ति पर आधारित रही जो आम लोगों से उठकर महामंत्री के पद पहुंचता है।
इस नाटक का मंचन लोकदेवता बाबा रामदेव की आराधना करने के लिए गाई जाने वाली जम्मा जागरण शैली में हुआ। कहानी एक चतुर महामंत्री सुजान और उसके सच्चाई के साथ अंत तक डटे रहने पर आधारित है।
दरअसल, राजा अपने महामंत्री पद के लिए प्रजा के बीच से ही सुजान को चुनते हैं। जल्द ही सुजान अपनी सूझबूझ से काम करने के लिए आसपास के राज्यों तक में चर्चित हो गया। यह बात रानी विजया को रास नहीं आई, क्योंकि वो अपने भाई को इस पद पर बैठाना चाहती हैं।
रानी व उसके भाई ने मिलकर सुजान को झूठा साबित करने व जान से मारने की कई कोशिशें की, लेकिन वे सफल नहीं हो पाए। कई राजाओं व प्रजातंत्र में से भी लोगों ने उसे गिराने की कोशिश की।
अंत में रानी राजा को सुजान के घर ले जाकर कहती है कि रात को छिपकर अपने घर में दुश्मनांे से मिलता है। जब राजा अपने सैनिकों के साथ वहां पहुंचता है तो देखता है कि सुजान जो इतनी शोहरत मिलने के बाद भी अपनी झोपड़ी में रहता है वो अपने पुराने कपड़ों और समानों से बात करता है। सुजान ने कहा कि वो अपनी औकात नहीं भूलना चाहता है। हमेशा अपनी जड़ों से जुड़ा रहना चाहता है। इसलिए वो अपने पुराने दिन नहीं भूलता है।
प्रदर्शन प्रभारी संजीव पुरोहित ने बताया कि नाटक में मुकेश सेवग, जया पारीक, सुनीलम, संजीव पुरोहित, अनिता जोशी, भरतराज, सुनील व्यास, योगेश हर्ष, सुरेश बिस्सा, जयवर्धन हर्ष, निष्ठाा, नैतिक, पुनीत, गर्वित, कमल सिंह, वैभव, नीसु, भुवेश, सत्यम आदि ने अपने पात्रों के अनुसार अभिनय किया। प्रकाश प्रभाव रोहित बोड़ा का था। तबले पर संगत टीपू सुल्तान की रही। अन्य व्यवस्थाओं में जीतू पारीक, नीलम पुरोहित आदि शामिल रहे।
मायड़ भाषा में लिखे गये इस प्रसिद्ध लोकनाटक एसो चतुर सुजान 1 घंटा 20 मिनट तक चला।
डायलॉग के साथ हामर्माेनियम, तथला बजाते-गाते लोकगायकों ने दर्शकों को अंत तक बांधे रखा। रविवार की शाम को शिल्पग्राम का दर्पण सभागार दर्शकों से भरा रहा। इस अवसर पर केन्द्र के कार्यक्रम अधिकारी पवन अमरावत, पूर्व कार्यक्रम अधिकारी विलास जानवे एवं वरिष्ठ छायाकार राकेश शर्मा ‘राजदीप’ ने अंत में रंगकर्मियों का अभिनन्दन किया। संचालन दुर्गेश चांदवानी ने किया।
Author: Sarjit Singh







