December 1, 2025 5:12 am

राजस्थान में बढ़ता प्रदूषण और पर्यावरण शिक्षा का अभाव- सरकार की खामोशी खतरनाक संकेत…..

Sarjit Singh

Sarjit Singh

राजस्थान में बढ़ता प्रदूषण और पर्यावरण शिक्षा का अभाव- सरकार की खामोशी खतरनाक संकेत……

राजस्थान में बढ़ता प्रदूषण और पर्यावरण शिक्षा का अभाव- सरकार की खामोशी खतरनाक संकेत…..

बीकानेर, @MaruSangram। राजस्थान इन दिनों जिस गंभीर पर्यावरण संकट से गुजर रहा है, वह केवल प्रदूषण का मुद्दा नहीं, बल्कि एक व्यापक स्वास्थ्य आपातकाल का रूप ले चुका है।

राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में वायु, जल और मिट्टी का प्रदूषण इतने चिंताजनक स्तर पर पहुँच चुका है कि इसका सीधा असर आमजन के स्वास्थ्य, पशुधन, कृषि और प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्र पर पड़ रहा है।

बीकानेर, जोधपुर, बालोतरा, कोटा, टोंक और जयपुर जैसे शहर लगातार AQI के रेड और ऑरेंज ज़ोन में दर्ज हो रहे हैं। हवा में PM2.5 और PM10 के स्तर WHO मानकों से कई गुना अधिक हैं, जिससे श्वास संबंधी रोग, फेफड़ों के संक्रमण, आँखों में जलन, हृदय रोग और कमजोर प्रतिरोधक क्षमता के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं।

ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति और भी भयावह होती जा रही है—फैक्ट्रियों का बिना ट्रीटमेंट छोड़ा गया अपशिष्ट जल खेतों में फैल रहा है, कुएँ और तालाब दूषित हो चुके हैं और गाँवों में जलभराव के कारण लोग अपने घर-खेत छोड़कर पलायन करने को मजबूर हैं।

बीकानेर जैसे अति-संवेदनशील मरुक्षेत्र में तापमान सामान्य से कहीं अधिक तेज़ी से बढ़ रहा है। खेजड़ी जैसे पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने वाले वृक्षों का अवैध कटान, रेतीले क्षेत्रों में धूल प्रदूषण, भूजल का गिरता स्तर और शहरी विस्तार के कारण प्राकृतिक आवरण लगभग समाप्त होता जा रहा है। यह वह क्षेत्र है जहाँ पर्यावरण शिक्षा और जागरूकता सबसे अधिक आवश्यक है, क्योंकि यहाँ समस्या सिर्फ प्रदूषण की नहीं, बल्कि पूरे रेगिस्तानी पारिस्थितिकी तंत्र के विघटन की है। लेकिन विडंबना यह है कि राजस्थान के कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में पर्यावरण शिक्षा लगभग नदारद है। जिस समय इसकी सबसे अधिक जरूरत है, उसी समय शिक्षा तंत्र में इसकी अनुपस्थिति सबसे स्पष्ट दिखाई देती है।

नई शिक्षा नीति (NEP-2020) स्पष्ट रूप से निर्देश देती है कि पर्यावरण शिक्षा को प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा तक अनिवार्य विषय के रूप में पढ़ाया जाए। UGC ने 2023 और 2024 के दिशा-निर्देशों में यह अनिवार्य किया है कि स्नातक स्तर पर Environmental Studies को एक Compulsory Subject के रूप में शामिल किया जाए और इसे पढ़ाने के लिए योग्य फैकल्टी का होना आवश्यक है। लेकिन राजस्थान में इस दिशा में एक भी ठोस कदम नहीं उठाया गया है। न कॉलेजों में पर्यावरण अध्ययन की नियमित कक्षाएं चल रही हैं, न स्थायी फैकल्टी है और न ही Vidya Sambal Yojana के तहत अतिथि संकाय उपलब्ध कराया गया है। नया सत्र शुरू होने के बावजूद हजारों विद्यार्थी बिना शिक्षक के ही इस महत्त्वपूर्ण विषय की परीक्षा देने को मजबूर हैं। यह न केवल NEP और UGC नियमों का उल्लंघन है, बल्कि छात्रों के शैक्षणिक अधिकारों पर सीधा प्रहार भी है।

MGSU बीकानेर द्वारा कुछ समय पूर्व पर्यावरण अध्ययन के पदों का विज्ञापन जारी किया गया था, लेकिन आश्चर्यजनक रूप से आज तक न इंटरव्यू हुए और न ही किसी संकाय की नियुक्ति। विश्वविद्यालय परिसर से लेकर इसके संबद्ध कॉलेजों तक, हर जगह यह विषय बिना शिक्षक के ही “कागज़ी अनिवार्यता” बनकर रह गया है। जिस राज्य में औद्योगिक प्रदूषण, तापमान वृद्धि, भूजल संकट और पेड़ों की कटाई चरम पर हो, वहाँ पर्यावरण शिक्षा का अभाव केवल अकादमिक लापरवाही नहीं बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य के प्रति गंभीर उदासीनता है।
राज्य सरकार, उच्च शिक्षा विभाग, विश्वविद्यालय प्रशासन, कुलपति और संबंधित मंत्रालयों की इस मुद्दे पर चुप्पी बेहद चिंताजनक है।

प्रदूषण धीरे-धीरे आपदा का रूप ले रहा है, ग्रामीण आजीविका खत्म हो रही है, शहरों की हवा सांस लेने लायक नहीं रह गई है, लेकिन शिक्षा तंत्र में पर्यावरण को लेकर न संवेदनशीलता दिखती है और न ही कोई सक्रिय पहल। यह सवाल अनिवार्य रूप से उठता है कि आखिर कब तक सरकार इस विषय को नज़रअंदाज़ करती रहेगी? क्या हम उस भविष्य का इंतजार कर रहे हैं जहाँ प्रदूषणजनित बीमारियाँ, जल संकट और तापमान वृद्धि सामान्य हो जाएँ?

समाधान स्पष्ट है-राजस्थान में पर्यावरण शिक्षा को तत्काल संवैधानिक और व्यावहारिक रूप से लागू किया जाए। कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में Environmental Studies की कक्षाएँ तुरंत प्रारंभ की जाएँ, योग्य स्थायी फैकल्टी की नियुक्ति की जाए, Vidya Sambal Yojana के अंतर्गत अतिथि संकाय को तत्काल जोड़ा जाए और NEP के अनुसार पर्यावरण अध्ययन को फील्ड वर्क, अनुसंधान, स्थानीय समस्याओं और व्यवहारिक सीख से जोड़ा जाए। साथ ही, प्रदूषण प्रभावित जिलों में विशेष पर्यावरण मिशन शुरू किया जाना चाहिए ताकि स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार समाधान विकसित किए जा सकें।

राजस्थान का पर्यावरण संकट किसी एक विभाग का विषय नहीं है—यह पूरे समाज, कृषि, मानव स्वास्थ्य और भविष्य की पीढ़ियों से सीधे जुड़ा प्रश्न है। यदि आज भी हम पर्यावरण शिक्षा को प्राथमिकता नहीं देंगे, तो आने वाले वर्षों में समस्याएँ इतनी बड़ी हो जाएँगी कि उन्हें संभालना लगभग असंभव होगा। इसलिए यह समय कार्रवाई का है, जागरूकता का है और शिक्षा को वास्तविक अर्थों में जीवन रक्षा का माध्यम बनाने का है।

राजस्थान को अब पर्यावरण शिक्षा को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शामिल करना ही होगा, क्योंकि यह मांग केवल एक विषय की नहीं, बल्कि जीवन और अस्तित्व की रक्षा की मांग है।

लेखक : Dr. R. K. Saran
Agro-Ecology Expert, JJVS Udaipur

Increasing pollution and lack of environmental education in Rajasthan – the government’s silence is a dangerous sign…

Increasing pollution and lack of environmental education in Rajasthan – the government’s silence is a dangerous sign…

Bikaner, @MaruSangram. The serious environmental crisis that Rajasthan is currently facing is not just a pollution issue, but has become a widespread health emergency.

Air, water, and soil pollution in various regions of the state has reached such alarming levels that it is directly impacting public health, livestock, agriculture, and natural ecosystems.

Cities like Bikaner, Jodhpur, Balotra, Kota, Tonk, and Jaipur are consistently falling into the red and orange zones of the AQI. Levels of PM2.5 and PM10 in the air are several times higher than WHO standards, leading to a rapid increase in cases of respiratory diseases, lung infections, eye irritation, heart disease, and weakened immunity.

The situation in rural areas is becoming even more dire—untreated factory wastewater is spreading into fields, contaminating wells and ponds, and flooding in villages is forcing people to flee their homes and farms.

In highly sensitive desert regions like Bikaner, temperatures are rising faster than normal. Illegal felling of trees like the Khejri, which maintain ecological balance, dust pollution in sandy areas, falling groundwater levels, and urban expansion are all leading to the near-destruction of natural cover. This is a region where environmental education and awareness are most essential, as the problem here is not just pollution but the disruption of the entire desert ecosystem. Ironically, environmental education is virtually absent from Rajasthan’s colleges and universities. At the very time when it is most needed, its absence in the education system is most evident.

The New Education Policy (NEP-2020) clearly mandates that environmental education be taught as a compulsory subject from primary to higher education. The UGC has mandated in its 2023 and 2024 guidelines that Environmental Studies be included as a compulsory subject at the undergraduate level, and that qualified faculty be required to teach it. However, not a single concrete step has been taken in this direction in Rajasthan. Colleges are running no regular environmental studies classes, nor is there a permanent faculty, nor has guest faculty been provided under the Vidya Sambal Yojana. Despite the start of the new semester, thousands of students are forced to take exams in this crucial subject without a teacher. This is not only a violation of the NEP and UGC regulations, but also a direct attack on students’ educational rights.

MGSU Bikaner recently advertised for positions in environmental studies, but surprisingly, to date, neither interviews have been conducted nor any faculty has been appointed. From the university campus to its affiliated colleges, the subject remains a mere “paper requirement,” without a teacher. In a state where industrial pollution, temperature rise, groundwater scarcity, and deforestation are rampant, the lack of environmental education represents not just academic negligence but a profound indifference to the future of future generations.

The silence of the state government, the Higher Education Department, university administrations, vice-chancellors, and related ministries on this issue is deeply worrying.

Pollution is slowly becoming a disaster, rural livelihoods are being destroyed, and urban air is no longer breathable, yet the education system shows neither sensitivity nor proactive initiatives regarding the environment. The question inevitably arises: how long will the government continue to ignore this issue? Are we waiting for a future where pollution-related diseases, water scarcity, and temperature rise become the norm?

The solution is clear: environmental education must be immediately implemented in Rajasthan, both constitutionally and practically. Environmental Studies classes must be immediately introduced in colleges and universities, qualified permanent faculty must be appointed, guest faculty must be immediately added under the Vidya Sambal Yojana, and environmental studies must be integrated with field work, research, local problems, and practical learning, as per the National Environmental Policy (NEP). Also, special environmental missions should be launched in pollution-affected districts so that solutions can be developed according to local conditions.

Rajasthan’s environmental crisis isn’t a matter of any one department—it’s a question directly linked to society, agriculture, human health, and future generations. If we don’t prioritize environmental education today, the problems will become so massive in the coming years that they will be nearly impossible to handle. Therefore, it’s time for action, awareness, and to truly transform education into a means of survival.

Rajasthan must now make environmental education one of its top priorities, because this demand isn’t just about a subject, but about protecting life and existence.

Author: Dr. R. K. Saran
Agro-Ecology Expert, JJVS Udaipur

Sarjit Singh
Author: Sarjit Singh

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