

दुःखों से मुक्ति और सुख की प्राप्ति के उपाय पर संवाद, स्वामी विवेकानंद परिव्राजक ने समझाया कर्म और इच्छाओं का संबंध…..
दुःखों से मुक्ति और सुख की प्राप्ति के उपाय पर संवाद, स्वामी विवेकानंद परिव्राजक ने समझाया कर्म और इच्छाओं का संबंध……
बीकानेर, @MaruSangram।“जीवन एक परीक्षा है और कर्मों के अनुसार परिणाम अवश्य मिलता है।” यह बात स्वामी विवेकानंद परिव्राजक ने ‘दुःखों से निवृत्ति एवं सुखों की प्राप्ति के उपाय’ विषय पर आयोजित संवाद कार्यक्रम के दूसरे दिन कही। होटल पाणिग्रहण में आयोजित कार्यक्रम में बड़ी संख्या में उपस्थित लोगों से संवाद करते हुए स्वामी जी ने जीवन, कर्म, इच्छाओं और मानसिक शांति से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर विचार साझा किए।
स्वामी विवेकानंद परिव्राजक ने जीवन की तुलना एक परीक्षा कक्षा से करते हुए कहा कि जिस प्रकार विद्यार्थी परीक्षा के दौरान अपने उत्तर लिखता है और परीक्षा समाप्त होने के बाद ही सही-गलत का मूल्यांकन होता है, उसी प्रकार जीवन में किए गए कर्मों का परिणाम भी समय आने पर प्राप्त होता है।
उन्होंने कहा कि जीवन के सार्वभौमिक सिद्धांत को समझने के लिए तीन प्रमुख बिंदुओं पर विचार करना चाहिए: समस्या क्या है, समस्या का कारण क्या है और उसके कारण का निवारण क्या है। इन तीनों पहलुओं को समझकर कार्य किया जाए तो समस्या के समाधान का रास्ता स्वयं स्पष्ट होने लगता है।
इच्छाओं पर नियंत्रण से कम हो सकता है दुख
स्वामी जी ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में दुख आना स्वाभाविक है। दुख का एक प्रमुख कारण इच्छाओं की पूर्ति न होना और जरूरत से अधिक इच्छाएं रखना है। इच्छाएं पूरी होने के साथ कई बार नई इच्छाएं जन्म लेती रहती हैं।
उन्होंने दूसरों से अत्यधिक अपेक्षाएं रखने से बचने की सलाह देते हुए कहा कि जब दूसरे व्यक्ति हमारी अपेक्षा के अनुरूप कार्य नहीं करते तो निराशा और दुख पैदा होता है। इसलिए अपेक्षाएं सीमित रखें और किसी कार्य के परिणाम में हां और ना दोनों परिस्थितियों को सहजता से स्वीकार करने की तैयारी रखें।
सहनशीलता को बताया सकारात्मक जीवन का आधार
स्वामी जी ने कहा कि जाने-अनजाने सभी से गलतियां होती हैं। उन्होंने सहनशीलता को जीवन का सुंदर आभूषण बताते हुए सकारात्मक सोच अपनाने पर जोर दिया। उनका कहना था कि व्यक्ति को अपनी क्षमता के अनुसार पूरी मेहनत से कार्य करना चाहिए और यदि सामने वाला उसके प्रयास का उचित मूल्यांकन नहीं कर पाए तो निराश नहीं होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि व्यक्ति को अपना कर्म किसी व्यक्ति या संस्था के लिए नहीं, बल्कि ईश्वर द्वारा दिए गए दायित्व के रूप में करना चाहिए। समय आने पर कर्म का उचित परिणाम अवश्य प्राप्त होगा।
स्वतंत्रता और स्वच्छंदता में बताया अंतर
स्वामी विवेकानंद परिव्राजक ने कहा कि व्यक्ति को कर्म करने की स्वतंत्रता मिली है, लेकिन स्वतंत्रता का अर्थ मनमानी करना नहीं है। अपनी इच्छा और बुद्धि के अनुसार कार्य करना स्वतंत्रता है, जबकि प्रकृति और कानून के नियमों की अनदेखी कर अपनी मनमानी करना स्वच्छंदता है।
उन्होंने लोगों से स्वतंत्रता के अधिकार का सदुपयोग करने और कानून सम्मत आचरण करने का आह्वान किया।
अच्छे और बुरे कर्मों का परिणाम समय पर मिलता है
उन्होंने कहा कि व्यक्ति अपनी अच्छाइयों का परिणाम तुरंत चाहता है, लेकिन बुरे कर्मों के परिणाम को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं होता। जबकि समय आने पर अच्छे और बुरे दोनों कर्मों का परिणाम प्राप्त होता है।
कार्यक्रम के दौरान स्वामी जी ने ईश्वर के प्रति विश्वास बनाए रखने, सकारात्मक सोच रखने, इच्छाओं पर नियंत्रण करने और अपने कर्मों को पूरी निष्ठा से करने का संदेश दिया।







